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dl437dl.rediffiland.com/
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joke
do kameene ek doosre ke uper dosharpan kar rahe the
ek kameene ne doosre kameene se kahaa: saale tu itnaa badhaa kameena hai tera padosi mar gaya
uske antim sanskar ki taiyaaree ho rahee thee seeddhi(stair) banayee jaa rahee thee aur jaise hee seedhi ban gayee
tu aaya aur seedhi maang raha hai ki seedhi de do jaraa fan saaf kurna hai.
doosra kameena bola : saale maine to only seedhee maangi thee wapis bhee to kur dee thee tu to itnaa badhaa kameena hai
tere padosee ka accident ho gayaa uski dono taange kut gayee usko dekhne hospital gayaa usko tu bolta hai
teree to dono taange kut gayee tu chaappal aur shoes ka kyaa karegaa mujhe dede.
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pl. dont mind
hello i want to tell first of all i m not writer.
meree hobby hai kaviyon ki achee kavitao ko jo mere dil ko choo jaye
on kavitaon ko tum sub logon se share kurna.kavita upne aap main ek
bahut badhaa barrod hai bus wo maximum logon tak pahunche.yahee meree koshish hai.
padh kur sub log jagrit hon kisne likhi hai it is important.but kitne jyada logon ne padhi its more
important.
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Anger & love have no limit
Anger and Love have no limits.
While Dad was polishing his new car, his 5 yr old son picked a stone & scratched lines on the side of the car.
In his anger, Dad took the child's hand & hit it many times, not realizing he was using a wrench.
At the hospital, his child said "Dad when will my fingers grow back?" Dad was so hurt.
He went back to car and kicked it a lot of times.
Sitting back he looked at the scratches, child had written "I LOVE YOU DAD"
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dunia ke asli ajube
दुनिया के असली अजूबे
हाल फिलहाल एक हुआ तमाशा, दुनिया वालों दो ध्यान जरा सा। विश्व में नए अजूबे चुने गए, एस एम एस से वोटिंग किए गए।
करोड़ों का हुआ वारा - न्यारा, देकर वास्ता इज्जत का यारा। भोली जनता को बनाया गया, ताज के नाम पर फंसाया गया।
मीडिया भी बेफकूफ बन गई, वह भी ताज के पीछे पड़ गई। जनता से सबने गुहार लगाई, जितने चाहो वोट दो भाई।
वोट के नाम पर खूब कमाया, भीख मांगने का नया तरीका पाया। अरे भाई! ताज कहाँ अजूबा है ? वहाँ तो सोई बस एक महबूबा है!
आज के युग में कितनी तरक्की है, ट्रेनें, हवाई-जहाज, सड़क पक्की है। राकेट, मिसाईल, कारें, सितारा होटल हैं, खुलती दिन रात जहाँ शैंपेन बोटल हैं।
आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे, प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।
विश्व का प्रथम अजूबा - ध्यान दें ! मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर दिखला दें! कोई माई का लाल साबित कर दे, इससे बड़ा अजूबा दुनिया में दिखा दे।
आओ दिखाता हूँ मैं आपको सच्ची अजूबे, प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।
दूसरा अजूबा भी हमारे देश में, नजरें उठा कर देख लो किसी भी शहर गली में। कचरे के डब्बों से खाना ढ़ूंढ़ता आदमी, उसी को खा कर अपनी भूख मिटाता आदमी।
आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे, प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।
तीसरा अजूबा - कीड़ों सा रेंगता आदमी, स्लम, फुटपाथ, ट्रैक पर जीवन बिताता आदमी। सड़कों पर सुबह, लोटा लेकर बैठा आदमी, देखिए अजूबा, मजबूर कितना आदमी।
और भी कितने अजूबे हैं हमारे देश में, एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में। एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में॥
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kavi ......................
हर रोज़ की तरह आज भी उसने सुबह के नाश्ते में कल के बासी चाँद पर चुपड़ ली थोडी ताजी धूप घी की तरह
किसी ने उसे नही टोका जब वो भरी दोपहर शहर की सबसे तेज़ सड़क पर खड़े होकर कहने लगा कि दरअसल ये सड़क एक नदी है जो बहती है खिड़की वाले पहाड़ों के बीच
उन्हीं खिड़किओं से झांकते सन्नाटे से काफी देर तक बातें की उसने और कई बातें बचाकर ले आया अपनी कलम में शाम के नाश्ते के लिए
वो रोज़ की तरह आदतन रुक गया उस दुकान पर जहाँ रोज़ बिकती थी ज़िंदगी टके सेर दिन भर के कमाए दुःख से आज फ़िर सपनों के शहर में उसने शब्द ख़रीदे और भूखा सो गया .
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aatma ki terhavin...............
आज आत्मा से हमारा हमेशा के लिए पीछा छूट गया। बचपन से ही हमारा हमारी आत्मा के साथ संघर्ष चला आ रहा है। जाने कैसी आत्मा इशु की थी भगवान् ने हमारी काया को, हम जो भी काम करें इसे पसंद ही नहीं आता, जब देखो अपनी टांग फंसाती रहती थी। पूरे बचपन की वाट लगा दी इस आत्मा की बच्ची ने। जब कभी जेबखर्च के लिए पिता जी की पैंट से पैसे चुराने की सोचते, इस आत्मा की चोंच चलने लगती। जैसे-तैसे कठिन परिश्रम करके पिता जी की जेब हलकी करते, रात होते ही आत्मा के प्रवचन शुरू हो जाते। नन्ही उम्र थी हमारी सो ज्यादा बहस नहीं कर पाते। आत्मा की बातों में आ जाते और पैसे वापस जेब में रख आते। जब भी परीक्षा में नक़ल करने बैठते, कमीनी आत्मा झक सफ़ेद कपडों में सामने आकर खड़ी हो जाती, बगल वाले की कॉपी पर पर हाथ रख लेती! इन आत्मा मैडम ने कई दफा फेल करवाया। १४-१५ साल की उम्र तक तो ऐसा हुआ कि हम आत्मा के मुकाबले थोड़ा कमज़ोर पड़ते रहे, लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे हमारे अन्दर ताकत का संचार हुआ। हमने अपने जैसे आत्मा पीड़ितों का एक ग्रुप बना लिया था, जिसकी नियमित बैठकें होतीं और आत्मा से निजात पाने के तरीकों पर मंथन किया जाता, कभी कभी गेस्ट फेकलटी को बुलाकर आत्मा की आवाज़ दबाने के तरीकों पर लेक्चर भी करवाया जाता। इसका नतीजा ये निकला कि अब ७०% मामलों में हमारी जीत होती और ३०% मामलों में आत्मा की। खैर,हम धीरे-धीरे बड़े होते गए। जुगाड़ लगाई तो क्लर्क बन गए और ईश्वर का कृपा से क्लर्की भी अच्छी चल निकली। पर ये धूर्त आत्मा को यह भी गवारा नहीं था। घूस ही तो खाते थे, इसके बाप का क्या लेते थे! जैसे ही रात होती तो हमें झिंझोड़ कर जगा देती और प्रवचन शुरू कर देती। हालाँकि अब तक हम मट्ठर पड़ने लग गए थे पर रात तो खराब हो ही जाती। एक दिन इस समस्या का भी समाधान हुआ। रोज़ की तरह आत्मा के उपदेश शुरू हुए तभी हमने देखा, ये सफ़ेद पेंट शर्ट वाली आत्मा के सामने बिलकुल वैसी ही भक काले पेंट शर्ट वाली आत्मा हमारे अन्दर से अवतरित हुई और आते ही कुलटा, कमीनी, मक्कार जैसी कई उच्च कोटि की गालियों से सफ़ेद आत्मा को नवाज़ दिया। अब हमें कुछ कहने का ज़रूरत नहीं थी, दोनों में आपस में मुंहवाद होता रहा। इसके बाद से तो वह वकीलनुमा आत्मा ही हमारी तरफ से बहस करती, हम आराम से सो जाते। सिलसिला चलता रहा, पर हाँ, अब हर बार सफ़ेद आत्मा ही हारती। हाँ...तो हम आज के झगडे का बात कर रहे थे। वैसे भी रोज़-रोज़ का किटकिट से तंग आ गए थे हम। आज तो उसने हलकान ही करके रख दिया, पीछे ही पड़ गयी हमारे। इतना जोर से चिन्घाड़ी कि जीना दूभर हो गया। ऐसा भी क्या कर दिया था हमने, छोटी सी बात थी। हुआ यूं की एक ठेले वाला हमसे अपने जवान बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र लेने आया, हमने तो भैया आदत के मुताबिक ५०० रुपये मांगे। झूठा कहीं का, कहने लगा की पैसे नहीं हैं। उम्र हो गयी ठेला चलाते-चलाते, इतना पैसा भी नहीं कमाया होगा क्या? और फिर जब हम किसी का काम बिना पैसे के नहीं करते तो इसका कैसे कर देते, आखिर सिद्धांत भी तो कोई चीज़ है। खैर ठेले वाला तो चला गया रोते कलपते पर ये आत्मा की बच्ची बिफर गयी। बहुत जलील किया हमें। सो हमने भी आज अन्तिम फैसला कर डाला, अपनी काली आत्मा को बुलाकर सुपारी दे डाली। और उसने सफ़ेद आत्मा का गला हमेशा के लिए घोंट दिया। हमें कोई ग़म नहीं उसकी मौत का। कोई गुनाह तो नहीं किया हमने, आखिर कानून में भी तो आत्मा के मर्डर के लिए कोई धारा नहीं बनी है। रोज़ ही तो लोग खुल्लम खुल्ला आत्मा का क़त्ल कर रहे हैं और हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं। बहरहाल, अगली ग्यारस को हमारी आत्मा की तेरहवीं है। पंडित ने बताया है की १०१ आत्माओं की आहूति देने से मरी आत्मा कभी वापस नहीं आती। सो सभी आत्मा पीडितों से अनुरोध है की अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर अपनी अपनी आत्माओं की आहूति दें और मृत्युभोज को सफल बनाएं!
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vijayee hogaa abhimanyou
हर मोड़ पर उलझा अभिमन्यु मरता है रोज़.
उम्र के साथ बुज़ुर्ग हो गये हैं भीष्म, बातें आदर्श की निष्ठा की, पर साथ दुर्योधन का शकुनी का, जिनकी गिरफ़्त में है सारा धर्म, ये समाज।
गद्दी पर आसीन जरासंध धृतराष्ट्र, मत करो अब कृष्ण का इन्तजार।
अभिमन्यु ही तोड़ सकता है, ये चक्रव्यहू, धर्म के ठेकेदारों का इन्द्रजाल धर्म के महाभारत का।
मुट्ठी भर पांडव बिखरे बन्द महलों में, करते कॄष्ण का इन्तज़ार.
द्रौपदी की लाज़ सुदामा की इज़्जत सरे आम लगती बोली रोज चौराहों पर कृष्ण नहीं हैं कहीं।
कॄष्ण ने तब भी नहीं दिया था साथ अभिमन्यु का मत करो उसका इन्तजार।
चाहिए अब एक नहीं सात-सात अभिमन्यु.
एक साथ एकजुट टूटेगा चक्रव्यहू, चाहिए समग्र चेतना नव नेतृत्व , अपने सामर्थ्य पर विजयी होगा अभिमन्यु अब इस बार।
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jindagi main har taraf.............
जिन्दगी एक तूफ़ान है यहाँ हर शक्स परेशान है अब तो गिर गया इमान है बेटा हो या बेटी दोस्त हो या रिश्ता कोई सब रिश्तो की गरिमा से अनजान है कंहा बिक नहीं रहा भगवान् है गुरु बन बेटा हर शेतान है हर तरफ खुली दुकान है क्यूँ उसका मेरे से ऊँचा मकान है उसकी मेहनत देख हेरान है क्या यही कुदरत का भेजा इंसान है जिन्दगी मे हर तरफ .......
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main akela hee diyaa hun...........
इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं; मत बुझाओ ! जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी !!
पांव तो मेरे थकन ने छील डाले अब विचारों के सहारे चल रहा हूं आंसूओं से जन्म दे-देकर हंसी को एक मंदिर के दिये-सा जल रहा हूं; मैं जहां धर दूं कदम वह राजपथ है; मत मिटाओ पांव मेरे देखकर दुनिया चलेगी !!
बेबसी मेरे अधर इतने न खोलो जो कि अपना मोल बतलाता फिरूं मैं इस कदर नफ़रत न बरसाओ नयन से प्यार को हर गांव दफनाता फिरूं मैं एक अंगारा गरम मैं ही बचा हूं । मत बुझाओ । जब जलेगी, आरती मुझसे जलेगी !!
जी रहो हो किस कला का नाम लेकर कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है, सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो वह हमीं बदनाम लोगों ने रची है; मैं बहारों का अकेला वंशधर हूं, मत सुखाऒ ! मैं खिलूंगा, तब नई बगिया खिलेगी !!
शाम ने सबके मुखों पर आग मल दी मैं जला हूं, तो सुबह लाकर बुझूंगा ज़िंदगी सारी गुनाहों में बिताकर जब मरूंगा देवता बनकर पूजूंगा; आंसूओं को देखकर मेरी हंसी तुम मत उड़ाओ ! मैं न रोऊं, तो शिला कैसे गलेगी !!
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yaad rakhna...........
नैनो मे बसे है ज़रा याद रखना, अगर काम पड़े तो याद करना, मुझे तो आदत है आपको याद करने की, अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......
ये दुनिया वाले भी बड़े अजीब होते है कभी दूर तो कभी क़रीब होते है दर्द ना बताओ तो हमे कायर कहते है और दर्द बताओ तो हमे शायर कहते है .......
एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर, हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर, मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना, हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर.........
ख़ामोशियों की वो धीमी सी आवाज़ है , तन्हाइयों मे वो एक गहरा राज़ है , मिलते नही है सबको ऐसे दोस्त , आप जो मिले हो हमे ख़ुद पे नाज़ है .......
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