हर रोज़ की तरह
आज भी
उसने सुबह के नाश्ते में
कल के बासी चाँद पर
चुपड़ ली थोडी ताजी धूप
घी की तरह
किसी ने उसे नही टोका
जब वो भरी दोपहर
शहर की सबसे तेज़ सड़क पर खड़े होकर कहने लगा
कि
दरअसल ये सड़क एक नदी है
जो बहती है खिड़की वाले पहाड़ों के बीच
उन्हीं खिड़किओं से झांकते सन्नाटे से
काफी देर तक बातें की उसने
और
कई बातें बचाकर ले आया अपनी कलम में
शाम के नाश्ते के लिए
वो
रोज़ की तरह आदतन रुक गया
उस दुकान पर
जहाँ रोज़ बिकती थी ज़िंदगी टके सेर
दिन भर के कमाए दुःख से
आज फ़िर
सपनों के शहर में उसने शब्द ख़रीदे
और भूखा सो गया .